सिवनी। जो बहुत दुखी होता है वही भगवान को सच्चे मन से ध्यान स्मरण करता है। जब कहि से कोई मदद नही मिलती तब लोग भगवान को स्मरण करते हैं। जबकि भगवान को हमेशा स्मरण करते रहना चाहिये। उक्ताशय की बात श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन गुरुवार को ग्राम पांजरा (केवलारी) में जारी श्रीमद्भागवत कथा में कथावाचक बोरीयाकला शंकराचार्य आश्रम रायपुर से पधारे कथा व्यास परमपुज्य 1008 यतिप्रवर दण्डी स्वामी डॉ. श्री इन्दुभवानन्द तीर्थ जी महाराज ने श्रद्धालुजनों से कहीं।
उन्होंने आगे कहा कि बनाने वाला भगवान तो है ही, वही बनने वाला भी भगवान होता है। जो लोग भगवान से मांगते हैं भगवान उन्हें बहुत देते हैं और जो भगवान से कुछ भी नहीं मांगते भगवान इतने दयालु हैं की बिना मांगे ही उन्हें अपने परम धाम दे देते हैं।
महाराज ने आगे कहा कि देवताओं और दैत्यों में युद्ध होता ही रहा है, एक बार देवता परास्त हो गए। देवता भगवान के पास पहुंचे तो भगवान ने कहा कि दैत्यों से संधि करना पड़ेगा। नीति यही कहती है कि बलवान से मित्रता कर लेना चाहिए। कार्य को मुख्य समझते हो तो दुष्ट व छोटे से भी मित्रता कर लेना हित कर होता है।
सभी देवता बलि के पास पहुँचे, इंद्र आदि देवता ने बलि से कहा कि समुद्र मंथन करना है। देवताओं और दैत्यों के समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा। अमृत का पान देवता कर लेंगे इससे वे अमर हो जाएंगे। फिर दैत्यों से देवता विजय पा सकते हैं।
















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