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31 Mar 2026, Tue

धार्मिक, विधि विधान से सम्पन्न हुआ यज्ञोपवीत संस्कार

सिवनी। नगर के कबीर वार्ड डूंडासिवनी स्थित नंदीकेश्वर धाम परशुराम मंदिर परिसर में जिला ब्राह्मण समाज के तत्वाधान में शुक्रवार को सुबह से शाम तक लगभग 55 बटुकों का यज्ञोपवीत संस्कार धार्मिक रीति रिवाज के साथ संपन्न हुआ।

पंडित जानकी वल्लभ मिश्र, पं. डॉ. सनत उपाध्याय सहित अन्य कर्मकांड ब्राह्मण की मौजूदगी व उनके द्वारा वैदिक मंत्रों से यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। इस मौके पर बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाज की महिलाएं पुरुष, बच्चे व बुजुर्ग ने अपनी सहभागिता दी। इसके साथ ही यहां समाज के होनहार बच्चों का भी सम्मान किया गया।

पं. डॉ. सनत उपाध्याय ने बताया कि यज्ञोपवीत संस्कार (जनेऊ/उपनयन) हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से एक प्रमुख संस्कार है, जिसमें पवित्र तीन धागों वाला जनेऊ धारण कराकर बालक को गायत्री मंत्र दीक्षा और वैदिक शिक्षा के योग्य बनाया जाता है। यह देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक के साथ अनुशासन व आध्यात्मिक विकास का सूचक है। यज्ञोपवीत का अर्थ और उद्देश्य: के विषय में उन्होंने बताया कि उपनयन का अर्थ है ‘गुरु के पास ले जाना’, जो शिक्षा की शुरुआत और आध्यात्मिक जन्म का प्रतीक है। तीन धागों का महत्व: जनेऊ के तीन धागे तीन ऋणों (देवऋण, पितृऋण, ऋषिऋण) या तीन वेदों का प्रतीक माने जाते हैं। इसमें मुंडन, पवित्र जल स्नान, यज्ञोपवीत धारण, गायत्री मंत्र दीक्षा, दंड धारण और भिक्षाचरण शामिल हैं।

उन्होंने आगे बताया कि जनेऊ पहनने का नियम होता है इसे बाएं कंधे के ऊपर और दाईं भुजा के नीचे पहना जाता है। मल-मूत्र त्याग के समय इसे कान पर चढ़ाया जाता है। वहीं उन्होंने आगे बताया कि वैज्ञानिक व धार्मिक लाभ: यह प्राण शक्ति को संतुलित करने, सूर्य नाड़ी को जगाने और अनुशासन व पवित्रता बढ़ाने में सहायक माना जाता है। यह संस्कार बटुक (बालक) को मानसिक संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रेरणा देता है।

मंडला से आए पं. चितरंजन तिवारी ने कहा कि बटुक ब्राह्मण। ब्राह्मण के घर जन्म लेने से ब्राम्हण नहीं होते। यज्ञोपवीत संस्कार होने पर ही द्विज (ब्राह्मण) होगा।

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