प्रांतीय प्राचार्यध्प्रधानाचार्य बैठक का शुभारंभ
विद्याभारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री अवनीश जी भटनागर रहे। मुख्य अतिथि हमारी शैक्षणिक गुणवत्ता ही हमें श्रेष्ठ बनाती है .अवनीश भटनागर सिवनी जिले की अग्रणी शैक्षणिक संस्था सरस्वती शिशुध्उण्माण्विद्यालय भैरोगंज सिवनी में दो दिवसीय प्राचार्यध्प्रधानाचार्य प्रांतीय बैठक का आयोजन विद्याभारती महाकौशल प्रांत की योजनानुसार किया जा रहा है। जिसका उद्घाटन विद्याभारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री अवनीश जी भटनागर द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं पूजा अर्चन द्वारा किया गया। इस उद्घाटन सत्र में विद्याभारती महाकौशल प्रांत के प्रांत संगठन मंत्री श्री अमित दवेए प्रादेशिक सचिव श्री सुधीर अग्रवालए प्रांत प्रमुख श्री शिवानंद सिन्हा एवं विवेकानंद बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष श्री दीपक साहू मंचासीन रहे। मंचासीन अतिथियों का स्वागत विद्याभारती जिला सिवनी के जिला सचिव श्री विनीत अग्रवाल एवं विवेकानंद बाल कल्याण समिति परिवार से उपाध्यक्ष श्री नूपेश ठाकुर एवं आचार्य परिवार की ओर से प्राचार्य श्री ओमप्रकाश यादव ने किया। इस अवसर पर विद्याभारती महाकौशल प्रांत के प्रादेशिक सहसचिव श्री नितिन चौधरीए प्रांत सहप्रमुख हरिराम तिवारीए प्रांत प्रशिक्षण प्रमुख श्री रविशंकर शुक्लए संस्कार केन्द्र प्रभारी श्री इंदल पटेलए प्रांत अंकेक्षण प्रमुख श्रीरामबहोरी पटेलए विभाग समन्वयक श्री मनोजपुरी गोस्वामीए श्री कमलेश अग्रहरिए श्री राजकुमार ठाकुरए श्री भास्कर वडनेरकर क्षेत्र खेल प्रमुख व श्री रामशिरोमणी शर्मा उपस्थित रहे। उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए माण् अवनीश जी भटनागर ने बैठक के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए सहभागी प्राचार्यध्प्रधानाचार्य से बैठक को औपचारिक न मानने का आग्रह किया उन्होनें कहा कि किसी भी विद्यालय का संचालन आसान नही है। प्रत्येक विद्यालय की अपनी अपनी अलग.अलग चुनौतिया होती है। उन चुनौतियों का स्थानीय स्तर पर अपनी परिस्थितियों के अनुसार सामना किया जाता है। सभी प्रकार के शैक्षणिक संस्थाओं की अपनी अपनी चुनौतियां है। संख्यात्मक कमी के कारण आज बडे़ बडे़ इंजीनियरिंग कॉलेजों भी बंद होते जा रहें है। किन्तु शैक्षणिक गुणवत्ता और अभिभावकों की अपेक्षाओं की पूर्ति कर हम इस चुनौती का सामना कर सकते है। सिवनी का सरस्वती शिशु मंदिर इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जहां दर्ज संख्या 1800 सौ से अधिक है। पुराणिक कथाओं में भक्त प्रहलाद के पिता हिरण कश्यप की कथा आती है जिसके पिता को ब्रम्हा जी से एक ऐसा वरदान प्राप्त हुआ था जिसमें उसे दिन रातए अंदर बाहरए नर.पशु आदि विभिन्न प्रकारों से न मारे जाने का वरदान प्राप्त था। किन्तु इस चुनौती को भी प्रयास पूर्वक पूरा किया गया और उसे नरसिह अवतार द्वारा मृत्यु प्राप्त हूई। आशय यह है कि हर चुनौती में सफलता का कोई ना कोई मार्ग छुपा रहता है। यदि हम चिंतन करें तो पाएगें कि हमारे सामने हिरण्य कश्यप को मारने जैसी इतनी बड़ी कोई चुनौती नही है। हम जिस चुनौती का सामना कर रहे है उसे हम अपने प्रयासों से आसानी से दूर कर सकते है। उन्होनें उदाहरण देते हुए बताया कि दिल्ली में सरदार पटेल हिन्दी माध्यम का विद्यालय है जहां 3800 से अधिक भैया बहिन पढ़ते है। इस हिन्दी माध्यम के विद्यालय में आईण् एण् एसण्ए आईण्पीण्एसण् जैसे उच्च अधिकारियों के बच्चे भी पढ़ते है। आसपास के अंग्रेजी माध्यम के बहुत अधिक विद्यालय होने पर भी अभिभावक उस हिन्दी माध्यम के विद्यालय में बच्चों को प्रवेश कराते है यह उस विद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता एवं अपने आप को उत्तम बनाने के प्रयासों का प्रमाण है। हमें भी अपनी गुणवत्ता वृद्धि के इन्ही प्रयासों की आवश्यकता है। मुम्बई में सिम्पोसिस कॉलेज किसी विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त नहीं है किंतु वहां पर देश भर से आकर छात्र प्रवेश लेते है क्योकि वहा कि शिक्षा की गुणवत्ता के कारण वहा पढे़ हुए विद्यार्थीयों को बड़ी बड़ी कम्पनियों में आसानी से कार्य प्राप्त होता है। विद्यालय की समस्त समस्याओं का समाधान शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार कर ही प्राप्त हो सकता है। विद्यालय का संचालन प्रतिदिन की कार्ययोजना प्राचार्यध्प्रधानाचार्य को ही बनाना है एवं क्रियान्वयन करना है। विद्यालय के 100 से अधिक ऐसे कार्य है जिन्हें प्राचार्यध्प्रधानाचार्य को विद्यालय की शैक्षणिक उन्नयन के लिए करना चाहिए। विद्यालय समय सारिणी बनानाए विद्यालय के भौतिक संसाधनों का रखरखाव करना मानक परिषद के प्रमुख प्रावधानों का ध्यान रखते हुए कार्य करना ही प्राचार्य के ही कार्य है। विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था में सुधार हेतु कई प्रकार के प्रयोग कर सकते है नवाचार कर सकते है। शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार करने में नवाचार की बहुत बड़ी भूमिका है। वही विद्यालय श्रेष्ठ है जिसकी श्रेष्ठता को समाज स्वीकार्य करता है। यदि समाज आपकी गुणवत्ता और श्रेष्ठता को स्वीकार करता है तो आप को छात्र संख्या की कभी कमी नही होगी। विद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता यदि अच्छी है तो समाज स्वयं मूल्यांकन करता है। विद्यालय का सबसे प्रमुख मूल्यांकनकर्ता समाज ही है। विद्यालय से संतुष्ट अभिभावक विद्यालय के सबसे प्रमुख प्रचारक है। हम अपने विद्यालय के कमजोर पक्ष न सुनना चाहते है ना सुधार करना चाहते है इसीलिए हमें सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं होता है। हम अपने अभिभावक के सुझाव पर ध्यान नही देते है सुझाव पर अनुकूल प्रतिसाद प्राप्त नही होने सुधार परिलक्षित न होने पर वे हमसे असंतुष्ट होते है। अभिभावक को हमें विभिन्न आयोजनों में आमंत्रित करना विद्यालय दर्शन करना चाहियें। अभिभावकों की जितनी अधिक सहभागिता विद्यालय में होगी हमारा दायरा उतना अधिक बढे़गा। जब अभिभावक और समाज हमारी प्रशंसा करेगा तब विद्य़ालय की प्रतिष्ठा बढ़ती है हमें 15 अगस्तए 26 जनवरी में समाज के प्रतिष्ठित किसी भी व्यक्ति को आमंत्रित करना चाहिए। हमें हमारे पुस्तकालयए प्रयोगशालाए कम्प्यूटर आदि शैक्षणिक संसाधनों का अधिकतम प्रयोग करना चाहियें। विद्यार्थियों को उनकी रूचि के अनुरूप शिक्षण व्यवस्था करना चाहियें। शिक्षण रोचक होगा तो भैया बहिनों का शैक्षणिक स्तर उन्नत होगा। परीक्षा परिणाम उत्तम होगा तो विद्यालय की प्रतिष्ठा बढेगी। हमारे भैया बहिनों के शैक्षणिक श्रेष्ठ पक्षों जैसे सुलेखए शुद्धलेखए वैण्गणितए घोष वादन आदि को समाज के सामने प्रस्तुत करना चाहियें इससे विद्यालय की प्रतिष्ठा बढे़गी। बिहार में नेबर हार्ट नामक विद्यालय से प्रतिवर्ष लगभग 10 आईण्एण्एसण्ए आईण्पीण्एसण् निकलते है यह उस विद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता को प्रमाणित करता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि हमारी गुणवत्ता ही हमें श्रेष्ठ बनाती है। हमें अपने स्तर पर अपने विद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता को बढ़ाने का प्रयास करना है। यदि हम यह कर सकें तो हमारा विद्यालय का विकास कोई नही रोक सकता। इसके उपरांत माण् भटनागर जी ने विद्यालय के पूर्व छात्रों से अनौपचारिक भेंट की एवं उन्हें सम्बोधित करते हुए उनके विद्यालय के प्रति प्रेम और आत्मीयता को पूर्व छात्र परिषद का आधार निरूपित किया उन्होने बताया कि आज दुनिया के 90 से अधिक देशों में शिशु मंदिर के पूर्व छात्र निवास कर रहें है। शिशु मंदिर का पूर्व छात्र होना उनके बीच आत्मीयता के रिश्ते का निर्माण करता है और उन्हें एक दूसरे से जोड़ देता है। शिशु मंदिर के पूर्व छात्र शिशु मंदिर की विकास यात्रा के अभिन्न अंग रहें है मुझ गर्व है कि मैं भी सरस्वती शिशु मंदिर का पूर्व छात्रए आचार्यए व्यवस्थापक और विद्याभारती का एक दायित्ववान कार्यकर्ता रहा हूॅं। उन्होनें विद्यालय के पूर्व छात्रों से पूर्व छात्र परिषद में ऑनलाइन रजिष्ट्रेशन का आग्रह करते हुए बताया कि वर्तमान में 10 लाख से अधिक पूर्व छात्र इस पोर्टल पर अपना पंजीयन करा चुकें है। प्रथम दिवस के तृतीय चरण में माण् अवनीश जी ने पंचपदीय शिक्षण पद्धति के विषय में बडे़ रोचक अंदाज में समझाते हुए शैक्षणिक नवाचारों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होनें अपने व्याख्यान में बताया कि अध्यापक सिखाता नहीं है सीखने का वातावरण निर्मित करता है। सीखने की प्रक्रिया प्राकृतिक होती है मनए बुद्धिए चित्तए अहंकार सीखने की क्रिया में अलग.अलग भूमिका का निर्वाह करते है। बच्चे में जिज्ञासा होती है शिक्षण के दौरान जिझासा जितनी बढ़ती है उसके सीखने की प्रक्रिया उतनी तीव्र होती है। अतः छात्र की जिज्ञासा की वृद्धि करना शिक्षक का प्रमुख कार्य है। पंचपदीय शिक्षण पद्धति सीखने की वैज्ञानिक और प्रमाणिक पद्धति है। करणों का ;अंत करण और बहिकरणद्ध का विकास करना शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है। उपरोक्त प्रांतीय प्राचार्यध्प्रधानाचार्य बैठक का समापन कल दिनांक 14 दिसम्बर 2025 को सायं 6ण्00 बजे सम्पन्न होगा। उल्लेखनीय है कि उपरोक्त बैठक में महाकौशल प्रांत के 24 जिलों के लगभग 150 प्राचार्यध्प्रधानाचार्य सहभागी हो रहे हैं।
प्रांतीय प्राचार्यध्प्रधानाचार्य बैठक का शुभारंभविद्याभारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री अवनीश जी भटनागर रहे

