सिवनी। जिला मुख्यालय से 14 किलोमीटर दूर लखनवाड़ा जैतपुर के समीपस्थ गांव खैरीकलां में चल रही श्री रामचरित मानस नवाह परायण ज्ञान यज्ञ के छठवें दिन शनिवार को कथा प्रवक्ता सुश्री लक्ष्मीमणि शास्त्री जी ने प्रभु श्रीराम की लीलाओं व भरत प्रसंग का वर्णन किया।
रामकथा स्थल में ब्रह्मलीन जगत गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी के शिष्य पं. हितेंद्र पाण्डे (मातृधाम, काशी) महाराज का भी आगमन हुआ।
सुश्री लक्ष्मीमणि जी ने श्रीराम कथा के छठवें दिन भरत मिलाप के प्रसंग में भरत के त्याग को विश्व का सर्वश्रेष्ठ आदर्श बताते हुए लोगों से उनके पदचिन्हों पर चलने का आह्वान किया।
उन्होंने आगे बताया कि भगवान श्रीराम ने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा का पालन करते हुए 14 वर्ष का वनवास बिना किसी संकोच के स्वीकार किया। उन्होंने इसे त्याग और पितृ-आज्ञा का अनुपम उदाहरण बताया। सुश्री लक्ष्मीमणि ने कहा कि श्रीराम का वन गमन हमें कर्तव्य और धर्म के महत्व को सिखाता है।
कथा का दूसरा प्रमुख हिस्सा चित्रकूट में श्रीराम और भरत का मिलाप था। सुश्री लक्ष्मीमणि ने बताया कि जब भरत को श्रीराम के वनवास और पिता दशरथ के निधन की सूचना मिली, तो वे अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने अयोध्या का राजपाट छोड़कर श्रीराम को वापस लाने के उद्देश्य से चित्रकूट की यात्रा की।
चित्रकूट में भरत श्रीराम के चरणों में गिर पड़े और दोनों भाइयों की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। श्रीराम ने भरत को समझाया कि पिता की आज्ञा और धर्म का पालन ही जीवन का आधार है। इस प्रसंग को सुनकर उपस्थित श्रद्धालु भावुक हो उठे। राम कथा में बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद थे।



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