तीर्थंकर द्वय भगवान अजितनाथ एवं संभवनाथ स्वामी का हुआ महाभिषेक
सिवनी। जैन संस्कृति में 24 तीर्थंकर भगवतों में द्वितीय एवं तृतीय तप्त स्वर्ण के स्वर्णिम सुंदर आभा वाले वर्ण रूप के तीर्थंकर क्रमशः भगवान अजितनाथ एवं भगवान संभवनाथ स्वामी के चैत्र कृष्ण पंचमी एवं चैत्र कृष्ण षष्ठी तिथि पर हुए निर्वाण से वे तिथियांभी आराध्यों के मोक्ष कल्याणक से पावन व मांगलिक हो गई। इस अवसर पर इन दोनो विशेष तिथियों में स्थानीय जैन मंदिरों में भगवान अजितनाथ स्वामी एवं भगवान संभवनाथ स्वामी का महाभिषेक पूजन कर शर्करा चूर्ण से निर्मित आकर्षक लाडू समर्पित किए गए।
इस अवसर पर जिनालयों में श्रीमंत सेठ एवं सवाई सिंघई बाझल परिवार के सभी सदस्यों के साथ स्थानीय जैन समाज के श्रद्धालुओ ने श्रीजी के निर्वाण उत्सव की आराधना की।उल्लेखनीय है कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के उपरांत द्वितीय तीर्थंकर अजितनाथ स्वामी वर्तमान अवसर्पिणी काल के तीर्थंकर है। इन तीर्थेशो का जन्म अयोध्या के इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय राजपरिवार में हुआ था। सम्मेद शिखर से प्रथम मोक्षगामी तीर्थंकर भगवान अजितनाथ का जन्म माघ के शुक्ल पक्ष की अष्टमी में हुआ था। इनके पिता का नाम महाराजा जितशत्रु और माता का नाम महारानी विजया था। आपकी प्रतिमा का मुख्य प्रतीक चिह्न गजराज है। आपके शासन देव देवी महायक्ष एवं रोहिणी है। चैत्र शुक्ल पंचमी को सम्मेद शिखर के सिद्धवर कूट से आपको निर्वाण की प्राप्ति हुई ।
वही तृतीय तीर्थंकर संभवनाथ स्वामी का जन्म मगसिर शुक्ल चतुर्दशी को श्रावस्ती राजधानी में महाराजा जितारी एवं महारानी सुषेणा के गृह में हुआ। अश्व आपकी प्रतिमा का प्रतीक चिह्न है।
प्रभु के शासन देव देवी – त्रिमुख देव एवं प्रज्ञप्ति देवी है। चैत्र शुक्ल षष्ठी को सम्मेद शिखर के धवल कूट से आपको निर्वाण की प्राप्ति हुई।
बड़े जैन मंदिर में प्रतिष्ठित है अजितनाथ स्वामी के तीन प्राचीन मूल मंदिर – भगवान अजितनाथ स्वामी के स्थानीय बड़े दिगंबर जैन मंदिर में तीन प्राचीन मूल जिनालय है। जिनमे सर्वाधिक प्राचीन बालाघाट वाले भाऊ साब का अजितनाथ जिनालय है।इसके अलावा प्रथम तल पर श्रीमंत सेठ गोपालसाव पूरन साव परिवार द्वारा निर्मित कांच वाला अजितनाथ स्वामी का सुंदर जिनालय एवं सबसे विशाल अजितनाथ भगवान की प्रतिमा जो श्रीमान राम रम्मा साव सवाई सिंघई बाझल परिवार द्वारा निर्मित जिनालय में वर्षो पूर्व प्रतिष्ठित की गई थी।
अपने पूर्वजों द्वारा निर्मित इस जिनालय का जीर्णउद्धार वर्तमान बाझल पीढ़ी द्वारा करवाकर एक नवीन आकर्षक रूप प्रदान किया गया। इस जिनालय में भगवान चंद्रप्रभ की 150 वर्ष से भी अधिक प्राचीन शुद्ध स्फटिक मणि की प्रतिमा दर्शनीय है।

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